स्वामी जी श्री 1008 श्री सूरतरामजी महाराज की आरती

आरती तेरी राम अभंगी ।

घट-घट चेतन आप असंगी ।।टेक।।

नहिं निराकार नहिं आकारा ।

राम जपे जप राम सँचारा ।।1।।

शेष महेश्वर पार न पावे ।

नेति-नेति ही निगम बतावे ।।2।।

आदि अंत मधि है इक सारा ।

जन सुरतराम सो राम पियारा ।।3।।