स्वामी जी श्री 1008 श्री नारायणदासजी (विदेही) महाराज की आरती

आरती कीजे रामजि केरी ।

जिन गूरू चरण शरण मैं तेरी ।।टेक।।

प्रथम आरती ब्रह्म विचारे ।

जीव ईश को भेद निवारे ।।1।।

द्वितीये दूर करे अभिलाषा ।

राम रूप होय लेवत श्वांसा ।।2।।

तृतीये तीन क्षीण कर डारे ।

निसिदिन एको राम उचारे ।।3।।

चतुरथ तुरत सिद्धपद पावे ।

सिद्ध रूप निश्चय होई जावे ।।4।।

पंचम पांच जीत के लीजे ।

अभय ज्ञान सबही कूं दीजे ।।5।।

जीव आपको रूप समावे ।

जामण मरण बहुर नहिं आवे ।।6।।

नारायणदास यह आरती गावे ।

जन हरि गुरू मेरे मन भावे ।।7।।