स्वामी जी श्री 1008 श्री कान्हड़दासजी महाराज (बड़ा) की आरती

आरती आतम राम तुम्हारी ।

तीन लोक में अति अधिकारी ।।टेक।।

परथम आरती प्रेम बंधाने ।

गुरू कुं गोबिन्द सम करि गाने ।।1।।

दूसरी आरती दोष निवारे ।

घट-घट रमताराम बिचारे ।।2।।

तीसरी आरती तिरगुण न्यारा ।

राम नाम निसि वासर प्यारा ।।3।।

चौथी आरती चित्त सुध होई ।

राम निरंजन और न कोई ।।4।।

पांचवी आरती कान्हड़ कीजे ।

पांचू जीति परम पद लीजे ।।5।।